रुप चतुर्दशी कि कहानी
रुप चतुर्दशी कि कहानी
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| रुप चतुर्दशी कि कहानी |
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रुप चतुर्दशी कि कहानी
एक समय भारत वर्ष में'हिरण्यगर्भ'नामक नगर में एक योगीराज रहते थे। उन्होने अपने मन को एकाग्र होके भगवान में लिन होना चाहा। अतः उन्होने समाधि लगा ली।समाधि लगाये कुछ हि दिन हुए थे कि उसके शरीर में किड़े पड़ गये,बालो में छोटे -छोटे किड़े पड़ गये।आँखो के रोय और बोहो पर जुंए जम गई कि योगीराज बहुत दुखी होने लगेइतने में हि नारद जी घुमते हुय वीणा और खरताल बजाते हुए आ गए।तब योगीराज बोले हे! भगवान् मैं भगवान के चिन्तन मे लीन होना चाहता था मेरी ये दशा क्यो हो गई?
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तब नारद जी बोले हे!योगीराज तुम चिन्तन करना जानते हो, परन्तु देह आचार का पालन करना नही जानते हो। इसलिए तुम्हारी ये दशा हुई है।
तब योगीराज ने नारद जी से देह आचार के बारे में पुछा।
तब नारद जी बोले अब देह आचार से तुम्हे अब कोई लाभ नहि।पहले मैं जो जानता हूँ उसे पहले करना फिर में तुम्हे देह आचार के बारे में बताऊगा।
थोड़ा रुक कर नारद जी ने कहा -इस बार जब कार्तिक कृष्ण पक्ष कि चतुर्दशी आवे उस दिन व्रत रखना और भगवान श्री कृष्ण की पूजा ध्यान से करना। ऐसा करने से तुम्हारा ये शरीर पहेले जैसा हि स्वस्थ और रुपवान हो जायेगा।
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योगीराज ने ऐसा हि किया और उसका शरीर पहले जैसा हि हो गया ।उसी दिन से इसको रुप चतुर्दशी कहते है।


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