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विलोम /विपरीतार्थक शब्द/प्रतिलोम

विलोम /विपरीतार्थक शब्द/प्रतिलोम विलोम शब्द का अर्थ:-किसी शब्द का विपरित अर्थ देने वाले शब्दो को विलोम शब्द कहते है। नोट-   1.शब्द जिस स्तर का हो ,उसका विलोम भी उसी स्तर का होना अति आवश्यक है। यदि शब्द तत्सम है तो विलोम भी तत्सम होगा,यदि शब्द तद्भभव तो विलोम भी तद्भव होगा। इसी प्रकार संज्ञा का विलोम संज्ञा तथा विशेषण शब्द का विलोम विशेषण होगा। जैसे - अधिक=न्यून। अधिक का विलोम कम नही होगा क्योकि कम शब्द उर्दू का है।कम का विलोम ज्यादा होता है। 2.  विलोम करने से पूर्व शब्द के अर्थ को समझ लेना चाहिए। विलोम शब्द निम्न है- शब्द               विलोम अंत                आदि अधिमूल्यन      अवमूल्यन अपराधी          निरपराध अथ                इति अथाह            छिछला अवर              प्रवर अवत्तल          उत्तल अत...

लिंग

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लिंग का अर्थ और लिंगका अर्थ- लिंग का शाब्दिक अर्थ है चिह्न/लक्षण। लिंग का अर्थ लिंग एक व्याकरणिक कोटी है। जो किसी वस्तु के स्त्रि या पुरूष जाति की होने कि सूचना देती हैं। लिंग के प्रकार हिंदी में लिंग दो होते है। (1)पुल्लिंग (2)स्त्रिलिंग प्रश्न- कौनसा शब्द हमेशा पुल्लिंग में व्यक्ति होता है- 1.श्री मान   2.नेत्ता     3. जोंक   4. खटमल        (4) उदाहरण- स्त्रिलिंग                         पुल्लिंग यक्ष                              यक्षिणी अध्यक्ष                         अध्यक्षा सभापति                       सभापत्ति पडो़सी                          पड़ोसिन कृपाकांक्षी               ...

वाच्य/हिन्दी व्याकरण

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वाच्य/हिन्दी व्याकरण वाच्य ओर उसके भेद क्रिया का वह रुप जो कर्ता  , कर्म या भाव कि प्रधानता सूचित करता हो वाच्य  कहलाता है अर्थात किसी भी वाक्यय में कर्ता कि प्रधानता है या कर्म कि प्रधानता है या फिर क्रिया कि  प्रधानता है। यह सुचित करना हि वाच्य है। हिन्दी में वाच्य तीन होता हैं- 1.कर्तृ वाच्य 2.कर्म वाच्य 3.भाव वाच्य 1.कृर्तृ वाच्य- १.कर्ता कि प्रधानता होती हैं। २.अकर्मक व सकर्मक दोनो प्रकार कि क्रियाओ का प्रयोग हो सकता है। ३.कर्ता के साथ ने या शून्य कारक चिन्ह का प्रयोग होता हैं। ४.यदि किसी वाक्य में कर्ता न हो (आज्ञार्थक वाक्य) तो उस वाक्य में आप या तुम शब्द का प्रयोग करके पुनः लिखने पर भी इनके कोई भी कारक चिन्ह न आये तो उस उस वाक्य में कृर्तृ वाच्य होता है। जेसे- 1.छात्र पुस्तक पढ़ता है। 2.छात्र ने पुस्तक पढ़ी। 3.थोड़ा जोर से पढो। 4.बच्चा रो  रहा है। (2) कर्म वाच्य १.कर्म कि प्रधानता होती हैं। २.केवल सकर्मक क्रिया का हि प्रयोग हो सकता हैं। ३.कर्ता के साथ 'से' या'के द्वार' कारक चिन्हो का प्रयोग होता है। ४.क्रिया जाना रूप में परिवर्ति...

वचन/हिन्दी व्याकरण/vachan

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वचन/हिन्दी व्याकरण/vachan वचन और उसके प्रकार वचन ऐसी व्याकरणीक कोटी है जो हमें वस्तुओ के एक या अनेक होने कि सुचना देती हैं। हिन्दी में दो वचन होते है 1.एक वचन 2.बहुवचन प्रश्नः-  निम्नलिखित शब्दो का बहुवचन बनाइए। नदी-    नदियाँ चिड़िया-  चिड़ियाँ विशेषता- विशेषताएँ, विशेषताओ बेटा      - बेटे,  बेटो पुत्री     - पुत्रीयाँ, पुत्रीयों अखबार-  खबर जंगल  -जंगलात अनेक -अनेक उदाहरण -  उसके बेटे ने परिक्षा पास कर ली। नोट-  बेटे शब्द में एक वचन है। (बहुवचन रूप में प्रयुक्त होने वाले शब्द ,इनका बहुवचन बनाना गलत माना जाता है।) बृन्द  ,गण  ,जन   ,लोग  ,गुरुजन इन शब्दो के साथ बहुवचन क्रिया का प्रयोग होता हैं। हस्ताक्षर, प्राण,  आँसू,  दर्शन,  समाचार ,भाग्य,  बाल। उदाहरण- प्राण निकल गये। प्राण पखेरू उड. गये। वाच्य और उसके भेद

रुप चतुर्दशी कि कहानी

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रुप चतुर्दशी कि कहानी रुप चतुर्दशी कि कहानी  यह चतुर्दशी कृष्ण  पक्ष में आती हैं।इस दिन सोन्दर्य रुप कृष्ण की पूजा करनी चाहिए ।इस दिन व्रत भी रखा जाता है।ऐसा करने से भगवान सुन्दरता देता है।इसी दिन नरक चतुर्दशी का व्रत रखा जाता है। नरक चतुर्दशी कि कहानी <<<ये भी पढ़े रुप चतुर्दशी कि कहानी गोवर्धन पूजा कि कहानी एक समय भारत  वर्ष में'हिरण्यगर्भ'नामक नगर में एक योगीराज रहते थे। उन्होने अपने मन को एकाग्र होके भगवान में लिन होना चाहा। अतः उन्होने समाधि लगा ली।समाधि लगाये कुछ हि दिन हुए थे कि उसके शरीर में किड़े पड़ गये,बालो में छोटे -छोटे किड़े पड़ गये।आँखो के रोय और बोहो पर जुंए जम गई कि योगीराज बहुत दुखी होने लगे         इतने में हि नारद जी घुमते हुय वीणा और खरताल बजाते हुए आ गए।तब योगीराज बोले हे! भगवान्  मैं भगवान के चिन्तन मे लीन होना चाहता था मेरी ये दशा क्यो हो गई? अहोई अष्टमी कि कहानी <<<ये भी पढ़े         तब नारद जी बोले हे!योगीराज तुम चिन्तन  करना जानते हो, परन्तु देह आचार का पालन करना नही...

नरक चतुर्दशी कि कहानी

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नरक चतुर्दशी कि कहानी नरक चतुर्दशी कि कहानी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी का दिन नरक चतुर्दशी  का पर्व मनाया जाता है। इस दिन नरक में मुक्ति पाने के लिए प्रातः काल तेल लागाकर अपर-मार्ग (चिचड़ी) पौधा के सहित जल से स्नान करना चाहिये। इस दिन यमराज के लिय दिप दान करना चाहिए। कहा जाता है इस दिन भगवान श्री कृष्ण  ने नरकासुर  नामक दैत्य का संहार किया था। नरक चतुर्दशी कि कहानी नरक चतुर्दशी कि कहानी प्राचिन सय में 'रन्तिदेव' नामक राजा  था। वह पहले जन्म में धरमात्मा और ज्ञानि था।उसी पूर्वकृत कर्मो से ,इस जन्म में भी राजा ने आपार दानादि देकर सत्य कार्य किये।जब उनका अन्त समय आया तब यमराज  उन्हे लेने आये।बार -बार राजा को आँखे निकालकर कह रहे थे-राजन्!नरक में चलो और तुम्है वही चलना पडे़गा?      इस पर राजा घबराया और नरक चलने का कारण पुछने लगा। यमदूत ने कहा-राजन्!आपने जो दान पूण्य किया है, उसे तोअखिल विश्व जानता है किन्तु आपको भगवान और धर्मराज हि जानता है ।       राजा बोला-उस पाप को मुझे भी बताओ जिसका निवारण कर सकुँ।      एक...

अहोई अष्टमी कि कहानी

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अहोई अष्टमी कि कहानी Ahoyi astami ki kahani यह त्योहार  कार्तिक पक्ष कि अष्टमी को मनाया जाता है।इस दिन बच्चो कि मा पूरे दिन व्रत रखती है। इस दिन सांयकाल तारे निकलने के बाद दीवाल पर अहोई बना कर उसकीहपूजा करें।व्रत रखने वाली माताए कहानी सुने। यह व्रत  बच्चो के कल्याण के लिए किया जाता है। अहोई  देवी के चित्र के साथ-साथ सेही और सेही के बच्चे के चित्र भी बनावें और पूजा  करें। धन तेरस कि कहानी   <<<<ये भी पढ़े।  अहोई अष्टमी कि कहानी बहुत पुराने समय कि बात है। भारत वर्ष के दतिया नामक नगरमें चन्द्रभान नाम का एक साहुकार रहता था। उसकि पत्नी का नाम चन्द्रिका था। वह बहुत ही गुणवान, रुपवती,चरित्रवान और पवित्र थी। उसके कई.पुत्र व पुत्रिया हुई। परन्तु वे सब कि सब छोटी उम्र में ही यमलोक को चले गये। संतान के इस तरह मर जाने से  दोनो दुखी रहते थे।वे पति पत्नि मन हि मन सोचा करते थे हमारे मरने.के बाद इस वैभव का कौन अधिकारी होगा।  एक दिन उन दोनो ने निश्चय किया कि सब धन दौलत को त्याग कर जंगल में निवास किया जाय । ऐसा निश्चय कर दूसरे दिन हि दोनो ...